अयोध्या में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव सहित पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि।

          अयोध्या, जो सनातन धर्म में भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में पूजनीय है, जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी एक अत्यंत पवित्र स्थान है। यह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव सहित पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। जैन मतानुसार, भगवान ऋषभदेव भगवान राम के पूर्वज थे, जिनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था।
          राम मंदिर निर्माण के बाद रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के पहले दूसरी बार जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी गणिका ज्ञानमती माता अयोध्या पहुंची। जैन साधक डा. जीवन प्रकाश बताते हैं कि उनके आगमन के बाद पूर्व प्रस्तावित योजना के अनुसार जैन मंदिर व धर्मशाला का पूरी तरह से कायाकल्प कराया गया है। इसके साथ ही मार्च माह में पंच कल्याणक महोत्सव का आयोजन किया। इस दौरान भगवान ऋषभदेव को केंद्र में रखकर 1700 से अधिक प्रतिमाओं की स्थापना कराई गयी। यह प्रतिमाएं अतीत-वर्तमान और भविष्य के वर्तमान चक्र के 24 तीर्थंकरों सहित अनेक काल और लोक में हुए सभी 720 तीर्थंकरों, प्रथम तीर्थंकर के 101 पुत्रों तथा 727 सिद्ध परमेष्टी की प्रतिमाएं शामिल हैं। इन नए-नए जिन मंदिरों के साथ अयोध्या का एक मानद तीर्थ बन गया है।
          पांच तीर्थंकरों की टोंक और उनका महत्व

अयोध्या के अलग-अलग मोहल्लों में इन पांच तीर्थंकरों से जुड़ी टोंक (मंदिर) स्थापित हैं, जहां देशभर से जैन श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं। ये तीर्थंकर और उनकी जन्मभूमि इस प्रकार हैं:

- प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव: इनका जन्म अयोध्या के रायगंज मोहल्ले में हुआ था, जहाँ उनकी 31 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है, जिसे 'बड़ी मूर्ति' के नाम से जाना जाता है।

         दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ: बक्सरिया टोला (बेगमपुरा) में इनकी टोंक मौजूद है।

- चौथे तीर्थंकर अभिनंदन स्वामी: रामकोट मोहल्ले में श्री रत्नपुरी जैन श्वेतांबर मंदिर स्थापित है।

- पांचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ: मोहल्ला कंधरपुर गोडियाना राजघाट में उन्हें समर्पित एक मंदिर है।

        14वें तीर्थंकर अनंतनाथ: इनका भी जन्म मोहल्ला कंधरपुर गोडियाना राजघाट में हुआ था।

दिगम्बर व श्वेताम्बर दोनों शाखाओं के मंदिर यहां हैं मौजूद

जैन धर्म की दो शाखाएं हैं जिनमें दिगम्बर जैन व श्वेताम्बर जैन शामिल हैं। इन दोनों शाखाओं के मंदिर व धर्मशालाएं यहां मौजूद हैं। इन दोनों शाखाओं के उपासकों की उपासना में कोई भेद नहीं है बल्कि दिगम्बर संत नग्न रहते हैं और आकाश को ही अपना वस्त्र मानते हैं। वहीं श्वेताम्बर जैन श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

और नया पुराने